5 साल थे तो पिता का हो गया निधन, गरीबी ने पहुँचाया अनाथ आश्रम, लेकिन IAS बनने का सपना नहीं टूटा

काफी कठिनाइयों के बावजूद भी जो इंसान आपके सपने को पूरा करने के लिए जीता और मरता हो और वहीं अगर आपके सपने के पूरा होने पर ना रहे तो यह इस बात का अफ़सोस ज़िन्दगी रहता है। कुछ ऐसा ही हुआ केरल के रहने वाले अब्दुल नासर (Abdul Nasser) के साथ।

जिनकी माँ ने उन्हें 6 वर्ष की उम्र में ही अनाथालय में रख दिया ताकि उनकी पढ़ाई में कोई बाधा ना हो और वह अच्छे से पढ़ाई कर एक बड़ा अधिकारी बन सके। लेकिन जब अब्दुल अपनी माँ के सपने को पूरा किए तब उसी दौरान उनकी माँ का इंतकाल हो गया और वह अपने बेटे को एक बड़ा अधिकारी बनते हुए नहीं देख पाई।

आपको बता दें तो जब अब्दुल की उम्र सिर्फ़ 5 साल थी तभी उनके सर से उनके पिता का साया उठ चुका था। पिता के देहांत के बाद 6-6 बच्चों की जिम्मेदारियों का बोझ एक विधवा माँ के सर पर आ पड़ा, जिसे संभालना उनके लिए बहुत मुश्किल था। लेकिन फिर भी वह जी जान लगाकर मेहनत किया करती थी ताकि उनके बच्चे पर लिख सके और अपने जीवन में कुछ अच्छा कर सके। उनकी माँ की हालत को देखते हुए कुछ लोगों ने उन्हें यह सुझाव दिया कि वह अपने सबसे छोटे बेटे अब्दुल को एक अनाथालय में रख दें। तब उनकी माँ ने उन्हें एक स्थानीय अनाथालय में रख दिया।

अनाथालय के नए परिवेश में रहना बहुत मुश्किल था

अनाथालय में रहकर बहुत कम उम्र में ही अब्दुल परिपक्व हो चुके थे उन्हें ज़िन्दगी का ज्ञान हो चुका था। परिवार का ख़र्च चलाने के लिए अब्दुल के भाई मज़दूर का काम किया करते तो वहीं उनकी बहने माँ के साथ बीड़ी बनाने के काम में लगी रहती है। पूरे परिवार की यही इच्छा थी कि अब्दुल अपनी पढ़ाई पर पूरी तरह से फोकस करें। अब्दुल के लिए भी अनाथालय के नए परिवेश में रहना बहुत मुश्किल था, क्योंकि सारे लोग नए थें और उनके साथ रहना बिल्कुल अलग था। इन मुश्किलों के बावजूद भी अब्दुल पूरे दिन अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करते। अनाथालय में ही सारे बच्चों के लिए प्राइमरी और हाई स्कूल की पढ़ाई की सुविधा प्रदान की गई थी।

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IAS अधिकारी से हुए प्रेरित

अब तक का अनाथालय में रहते हुए अब्दुल को 5 वर्ष तक हो चुके थे। 1 दिन की बात है जब एक IAS अधिकारी ने उस अनाथालय का दौरा किया उन्हें देखकर अब्दुल काफ़ी प्रेरित हुए और 10 वर्षीय अब्दुल उनकी तरह ही आगे चलकर IAS अधिकारी बनने का फ़ैसला लिए। अब्दुल ने देखा कि एक IAS ऑफिसर पूरी तरह आत्मविश्वास से भरा रहता है और उसकी एक इशारे पर ही लोग सारे काम करते हैं।

IAS बनने की राह में आई कई मुश्किलें

जब अब्दुल कुछ बड़े हुए तब उन्होंने ख़ुद के खर्चे और आगे की पढ़ाई के लिए नौकरी करने की सोची। तब उन्होंने उस अनाथालय से लगभग 30 से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कन्नूर की यात्रा की। वहाँ उन्होंने देखा कि होटल और रेस्टोरेंट में काम करना है युवाओं के लिए काफ़ी अच्छा था। अब्दुल वहाँ कुछ दिनों तक काम भी किए, लेकिन 1 दिन होटल के मालिक ने उन्हें बेवजह किसी बात पर डांट लगा दी तब उन्होंने वहाँ से अपने पैसे लेकर वापस अनाथालय की ओर आ गए। लेकिन इस समय भी अब्दुल का परिवार चाहता था कि वह नौकरी ना करके अपनी पढ़ाई पूरी करें।

पढ़ाई जारी रखने के लिए कई तरह के पार्ट टाइम जॉब भी किए

आगे अब्दुल ने अपने B.A और M.A की पढ़ाई के लिए कुछ पुस्तकों को खरीदने के लिए कई जगहों पर पार्ट टाइम जॉब भी किये जैसे, STD बूथ ऑपरेटर, अख़बार वितरक और डिलीवरी बॉय का। इस तरह इन्हीं पैसों से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। फिर काफ़ी मेहनत करने के बाद 1995 में उन्हें केरल स्वास्थ्य विभाग में एक जूनियर हेल्थ इंस्पेक्टर के रूप में नौकरी मिल गई और इसी दौरान अब्दुल की शादी रुखसाना नाम की एक लड़की से हो गई और उनकी पत्नी ने हीं उन्हें सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए प्रेरित किया और इन्हीं सब बातों से प्रेरणा लेकर अब्दुल अपनी आगे की पढ़ाई भी करते रहें।

मां और पत्नी ने बढ़ाया हौसला

आगे अब्दुल ने बताया कि पहले उनकी माँ और बाद में उनकी पत्नी ने उन्हें लगातार हौसला दिया और लगातार एक कलेक्टर बनने के लिए हौसला बढ़ाया। तब उसी वर्ष केरल राज्य सिविल सेवा कार्यकारी ने डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए आवेदन किए जा रहे थे। अब्दुल ने भी पद के लिए आवेदन किया। अब्दुल ने देखा कि हजारों आवेदन दिए गए हैं तब उन्होंने सोचा कि मेरा सिलेक्शन नहीं हो पाएगा, क्योंकि मैंने इसके लिए तैयारी ही नहीं किया है। लेकिन किस्मत को कौन जानता है जूनियर टाइम स्केल की स्थिति में प्रशिक्षण परिवीक्षा और नियुक्ति को पूरा होने में लगभग 10 साल लग गए और वर्ष 2006 में अब्दुल नासर को डिप्टी कलेक्टर के रूप में नियुक्त किया गया।

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बेटे को अधिकारी बनता नहीं देख सकी उनकी मां

अक्टूबर 2017 में अब्दुल नासर को आईएएस के पद पर पदोन्नत किया गया। उनकी सफलता से पूरा परिवार बहुत खुश था। लेकिन एक बात का अफ़सोस रहा कि उस दौरान उनकी माँ चल बसी और उनके इस सफलता की ख़ुशी में उनका साथ नहीं दे सकीं। आपको बता दे तो उनकी माँ की मृत्यु 2014 में ही हो चुकी थी।

नम आंखों से माँ को दिया धन्यवाद

अब्दुल ने कहा कि वही एक ऐसी महिला थी जो दुनिया में सबसे ज़्यादा उन्हें प्यार करती थी और उन्हीं के बदौलत आज वह सफलता के इस उचाई पर पहुँच सके। आज इस सफलता को पाने के बाद मुझसे ज़्यादा मेरे घरवाले गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। अपनी सफलता का सारा श्रेय वह अपने माँ को देते हैं। उन्हें अफ़सोस है कि काश वह भी मेरी सफलता को देख सकती, जिन्होंने इस सफलता में पूरा सहयोग दिया है। अगर वह रहती तो मुझे देख पाती कि कैसे एक अनाथालय में रहने वाला उनका बेटा आज अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया है। बिल्कुल ही नम आंखों से उन्होंने अपनी माँ को दिल से धन्यवाद दिया।

इस तरह आज हमने अब्दुल की कहानी को जाना और देखा कि कैसे इतनी छोटी उम्र से ही एक अनाथालय में रहने वाला लड़का आज सफलता की ऊंचाइयों पर है और कैसे छोटे-छोटे कामों को करके उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और अपने लक्ष्य पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। अब्दुल की सफलता पर पूरा देश उन्हें बधाई और उन्हें बहुत-बहुत शुभकामनाएँ देता है। आज वह पूरे युवा लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।