अखबार बेच की थी इंजीनियरिंग की पढ़ाई, अब TCS जैसी बड़ी कंपनी की नौकरी छोड़ बने IFS ऑफिसर

इंसान को ग़रीबी चाहे लाचारी कितनी भी मजबूर क्यों ना करे, आपके हौसले बुलंद होने चाहिए। ऐसे में अगर घर की मुखिया यानी आपकी माँ हौसला बढ़ाएँ तो आप कोई भी ल’ड़ाई आसानी से जीत सकते हैं। चाहे वह IAS, IPS या IFS ऑफिसर ही क्यों ना बनना हो।

यह संघर्ष की कहानी है IFS अधिकारी पी. बालमुरुगन (IFS Officer P. Balamurugan) की, जिनका हौसला बनी उनकी माँ और यही कारण है कि पी बालमुरूगन बन पाए एक IFS Officer. वैसे उनकी माँ तो ख़ुद दसवीं तक की पढ़ी हैं, लेकिन अपने बच्चों की पढ़ाई में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी और अपने ज़मीन का कुछ हिस्सा तक बेच दिया।

IFS-Officer-P-Balamurugan

पी बालमुरुगन जो चेन्नई के कीलकट्टलाई के रहने वाले हैं। बचपन में घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। उसी में पढ़ाई भी करनी थी इसलिए इन्हें अपनी पढ़ाई को जारी रखने के लिए अख़बार तक बेचने पड़े और वही अख़बार बेचने वाला लड़का आज राजस्थान के डूंगरपुर वन प्रभाग में एक परिवीक्षाधीन ऑफिसर के रूप में प्रशिक्षण ले रहा है।

अपने मुश्किल दिनों के बारे में बात करते हुए बालमुरुगन बताते हैं कि साल 1994 के आसपास इनके पिता घर छोड़कर चले गए। घर में आठ-आठ बच्चों का रहने खाने पीने का ख़र्च अलग था। पिता के घर छोड़ने के बाद सभी की जिम्मेदारी इनके माँ पलानीमल के कंधे पर आ पड़ी। स्थिति ऐसी थी कि रहने को घर तक नहीं था। तब इनकी माँ ने अपने कुछ गहने बेचकर एक छोटा सा घर लिया और उस घर का छत भी फूस का ही था। इन मुश्किलों की घड़ी में अगर किसी ने सबसे ज़्यादा सहयोग किया तो वह थें बालमुरुगन के मामा।

अपने शुरुआती दिनों के बारे में बालमुरूगन ने बताया कि एक बार इन्होंने किसी न्यूज़पेपर वेंडर से एक तमिल न्यूज़पेपर पढ़ने के लिए कहा, तब न्यूज़पेपर वाले ने कहा कि आप 90 रुपए महीने पर यह न्यूज़पेपर ले सकते हैं। लेकिन बालमुरूगन के पास पैसे नहीं थे इसलिए उन्होंने मना कर दिया। इनके मना करने के बाद न्यूज़पेपर वेंडर ने इन्हें 300 रूपये महीने की एक जॉब के बारे में बताया। तुरंत ही बालमुरूगन ने इस जॉब के लिए हामी भर दी।

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आपको बता दें तो उस समय उनकी उम्र सिर्फ़ 9 वर्ष थी और इतनी छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने अख़बार बेचने का काम शुरू कर दिया। अपने इसी पैसे से वह स्कूल की फीस भरते थे। बलमुरूगन ने अख़बार बेचने के साथ-साथ उसे पढ़ना भी शुरू किया और इनकी यही आदत एक जुनून में बदल गई और इनका झुकाव UPSC परीक्षा की तरफ़ होने लगा।

आगे चलकर बालमुरुगन मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी चेन्नई (Madras Institute of Technology, Chennai) से इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्यूनिकेशन ब्रांच से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल किए। किस्मत ने उनका साथ दिया और कॉलेज में ही कैंपस सिलेक्शन के द्वारा TCS जैसी बड़ी कंपनी में इन्हें नौकरी मिल गई। इन्होंने नौकरी तो शुरू कर दी, सैलरी भी अच्छी खासी थी। लेकिन फिर भी उनके मन में कहीं ना कहीं UPSC एग्जाम की ललक हर वक़्त रहती थी। नौकरी करने के साथ-साथ तैयारी करना भी संभव नहीं था लेकिन नौकरी छोड़ना भी इनके लिए असंभव था क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।

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कुछ दिनों के बाद इनकी बड़ी बहन भी कहीं जॉब करने लगी और धीरे-धीरे घर की आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक होने लगी। तब इन्होंने अपने फैसले के बारे में अपने घरवालों को बताया जिसमें इनके घर वालों ने पूरा सहयोग दिया और बालमुरूगन अपनी नौकरी छोड़कर UPSC परीक्षा की तैयारी करने के लिए चेन्नई चले गए। वहाँ जाकर इन्होंने शंकर IAS एकेडमी में दाखिला ले लिया। और अपनी कड़ी मेहनत के द्वारा UPSC की परीक्षा में सफलता हासिल की है लेकिन रैंक कम होने की वज़ह से इन्हें IAS जैसी पोस्ट ना मिल कर IFS का पद प्राप्त हुआ और उसके बाद बलमुरूगन भारतीय वन सेवा में नौकरी करने लगे।

अंत में उन्होंने कहा कि किसी भी विद्यार्थी को भूखे सो जाना चाहिए लेकिन कभी बिना पढ़े नहीं सोना चाहिए। इस तरह अपने परिवार के सहयोग और अपने मेहनत के दम पर पी बालमुरूगन अपने सपने को पूरा किए और सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँचे।