‘सुन नहीं सकता चपरासी कैसे बनेगा ?’ अधिकारी ने पिता से कहा था, बेटे ने IAS बन बढ़ाया था पिता का मान

Success Story of IAS Maniram Sharma – “विपरीत परिस्थितियों में कुछ लोग टूट जाते हैं, तो कुछ लोग रिकॉर्ड तोड़ देते हैं……! ” हम सभी के जीवन में कोई न कोई समस्या होती है, खासतौर पर जब बात जीवन में सफलता पाने की हो तो उसमें अनेक प्रकार की दिक्कतें आती हैं। गरीब और विकलांग लोगों के लिए तो जीवन और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है, लेकिन अगर आपके मन में कामयाबी पाने की सच्ची चाह है, तो आपके लिए सफलता के दरवाज़े ज़रूर खुलेंगे। हाँ, लेकिन यह तभी संभव हो सकता है, जब आप पूरे आत्मविश्वास के साथ कड़ी मेहनत करते हैं।

कई व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो अपनी शारीरिक अक्षमता की वज़ह से ख़ुद को कमजोर समझ लेते हैं और हिम्मत हार जाते हैं, लेकिन आज हम जिस बधिर व्यक्ति की बात कर रहे हैं, जिनके पिता मज़दूर थे और माता नेत्रहीन। इसके बावजूद उन्होंने अपनी शारीरिक कमी पर ध्यान न देते हुए परिश्रम का रास्ता चुना और अपने कठिन हालातों से लड़कर कामयाबी हासिल की और आईएएस अधिकारी बनकर अपना सपना पूरा किया।

मजदूर पिता और दृष्टिहीन माता के बधिर बेटे मनीराम शर्मा (IAS Maniram Sharma)

मजदूर पिता और दृष्टिहीन माता के बधिर बेटे मनीराम शर्माजिस शख़्स के बारे में हम बता रहे हैं, उनका नाम है मनीराम शर्मा (IAS Maniram Sharma) , जो सन 1975 में राजस्थान के अलवर जिले के बंदनगढ़ी नामक गाँव में जन्मे थे। वे अत्यंत गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे और उनके परिवार का संघर्ष केवल ग़रीबी तक ही सीमित नहीं था, परिवार में 2 लोग शारीरिक विकलांगता की समस्या से भी जूझ रहे थे। मनीराम की माताजी दृष्टिहीन थी तथा मनीराम की भी श्रवण क्षमता 5 वर्ष की आयु से ही कम होने लगी थी।

उनके पिताजी मजदूरी किया करते थे, इसलिए उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि पर अपने बच्चे का अच्छे से इलाज़ करवा सके। उचित इलाज़ ना मिल पाने की वज़ह से, जब मनीराम 9 वर्ष की आयु में आए तब उनकी श्रवण क्षमता पूरी तरह से चली गई। जहाँ एक ओर गाँव के बच्चे उचित शिक्षा व मार्गदर्शन ना मिलने के कारण अपनी ज़िन्दगी में मनचाही सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं, वहीं मनीराम तो शारीरिक तौर पर भी अक्षमता से लड़ रहे थे, पर मनीराम आम बच्चों से कुछ अलग थे, जीवन में अभावों और विकलांगता के बाद भी वे पूरी लगन से पढ़ाई किया करते थे।

परन्तु तब उनके गाँव में एक भी विद्यालय नहीं था। इस वज़ह से गाँव के दूसरे बच्चों को पढ़ने लिखने में दिक्कत आ रही थी, पर मनीराम में पढ़ने की इतनी लगन थी कि वे प्रतिदिन 5 किमी। तक पैदल ही चलते हुए गाँव के बाहर बने एक विद्यालय में पढ़ने के लिए जाते थे। मनीराम पूरी मेहनत से पढ़ाई किया करते, नतीज़न उन्हें राज्य शिक्षा बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में पांचवा और 12वीं की परीक्षा में सातवां स्थान मिला।

बधिरता के कारण नहीं मिली थी चपरासी की नौकरी

जब मनीराम ने 10वीं की परीक्षा पास की तो उनके पिता जी बहुत खुश हुए, क्योंकि उन्हें लगता था कि मनीराम को अब चपरासी की नौकरी तो मिल ही जाएगी। इसलिए मनीराम के मित्र जब घर आये और उन्होंने मनीराम के पिता जी को उनके 10वीं की परीक्षा पास करने के बारे में बताया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और मनीराम को एक विकास पदाधिकारी के पास ले गए, क्योंकि वे चाहते थे कि उनके बेटे को नौकरी मिल जाए।

फिर उन्होंने उस अधिकारी से कहा कि मेरा बेटे ने दसवीं कक्षा पास कर ली है इसलिए आप इसे चपरासी की नौकरी पर रख लीजिए। परन्तु उस अफसर ने कहा कि “यह तो सुन नहीं पाता। इसे न तो स्कूल की घंटी सुनाई देगी और न ही किसी की आवाज़ सुनाई देगी, तो यह भला कैसे चपरासी बनेगा?”

उस अधिकारी ने जो जवाब दिया, उससे मनीराम के पिताजी की उम्मीद टूट गयी और उनकी आंखों में आंसू छलक आए थे। लेकिन वे अफसर यह नहीं जानते थे कि मनीराम को चपरासी की नौकरी देने को मना करके उन्होंने अनजाने में ही उसके लिए आगे बढ़ने का मार्ग खोल दिया है, क्योंकि यदि मनीराम को उस दिन चपरासी की नौकरी मिल जाती, तो भविष्य में वे कभी IAS ऑफिसर नहीं बन सकते थे।

मनीराम को अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा था, जब उन्होंने अपने पिताजी को दुखी देखा तो उनसे कहा कि ‘पिताजी आप मुझ पर विश्वास कीजिए, अगर मैं पास हो गया हूँ तो एक दिन बड़ा ऑफिसर भी अवश्य बन जाऊंगा’। उनके पिताजी को भले ही उस वक़्त मनीराम की बातें अविश्वसनीय लगी हों, पर मनीराम अपनी कही बातों पर खरे उतरे और अपना कहा सच करके दिखाया।

ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई की और लेक्चरर बने

मनीराम के प्रिंसिपल को उनकी काबिलियत का आभास हो गया था, अतः वे चाहते थे कि मनीराम गाँव से बाहर जाकर अपनी शिक्षा पुर्ण करें। फिर उनके प्रिंसिपल ने मनीराम के पिताजी से बात करके उन्हें मनीराम को आगे की पढ़ाई के लिए बाहर भेजने हेतु मना लिया। मनीराम पढ़ाई के लिए गाँव से बाहर तो आ गए परंतु उन्होंने अपनी पढ़ाई और रहन-सहन का बोझ अपने पिताजी पर नहीं डाला। उन्हें अलवर जिले के एक कॉलेज में एडमिशन मिल गया। फिर उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का ख़र्च स्वयं ही उठाया।

जब मनीराम कॉलेज में दूसरे साल में थे, तब उन्होंने राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन का एग्जाम दिया तथा एग्जाम में पास होने पर उनको क्लर्क की जॉब मिल गयी। फिर कॉलेज में अंतिम साल तक वे पढ़ाई भी करते रहे और साथ ही क्लर्क की जॉब भी चालू रखी। वे पॉलिटिकल साइंस में पूरे कॉलेज में टॉपर हुए। फिर उन्होंने NET का एग्जाम दिया जिसमें उन्हें सफलता मिली और वह क्लर्क की जॉब छोड़ कर लेक्चरर बने।

लक्ष्य के बीच में अक्षमता आड़े आई

हालांकि लेक्चरर बनना एक बड़ी उपलब्धि थी, परंतु मनीराम अभी अपनी पढ़ाई से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने PHD करने का निश्चय किया। फिर मनीराम ने राजस्थान यूनिवर्सिटी में एमए, एमफिल के स्टूडेंट्स को पढ़ाते हुए पॉलिटिकल साइंस में PHD पूरी की। अब PHD करने के बाद मनीराम का एक ही अंतिम लक्ष्य रह गया था, वह था UPSC परीक्षा में पास होना। लेकिन यह लक्ष्य आसान नहीं था। यद्यपि मनीराम IAS बनना चाहते थे इसलिए उन्होंने वर्ष 1995 में भी UPSC का एग्जाम दिया था, पर वे प्रीलिम्स में भी पास नहीं हुए थे।

फिर जब वर्ष 2005 के पश्चात उन्होंने तीन बार यूपीएससी परीक्षा दी तब तीनो बार पास हुए। परन्तु उनके लक्ष्य के आड़े उनके शारीरिक अक्षमता आ रही थी। अगर वे बधिर ना होते तो संभवतः साल 2005 में ही IAS बनने का उनका लक्ष्य पूर्ण हो गया होता, पर बधिरता की वज़ह से उनको यह जॉब नहीं मिली।

इस तरह से पूरा किया लक्ष्य

वर्ष 2006 में उन्होंने पुनः कोशिश की और एक बार सिर्फ़ इस परीक्षा में पास हुए। इनको पोस्ट एंड टेलीग्राफ अकाउंट्स जैसी छोटी पोस्ट प्रदान की गई थी, पर उन्होंने यह जॉब स्वीकारी। अब मनीराम को भली भांति समझ में आ गया था कि जब तक उनके शारीरिक अक्षमता का इलाज़ नहीं हो जाता तब तक उनका लक्ष्य पूरा नहीं हो पायेगा, इसलिए उन्होंने अपनी अक्षमता का इलाज़ करवाने के उद्देश्य से जांच पड़ताल की, तो एक डॉक्टर से उन्हें पता चला कि यदि उनके कान का ऑपरेशन हो जाए, तो उनके सुनने की ताकत वापस आ जायेगी, लेकिन ऑपरेशन के लिए 7.5 लाख रुपयों की आवश्यकता रहेगी। वैसे मनीराम के पास इतने रुपए तो नहीं थे कि वह अपना इलाज़ करवा पाते लेकिन उन्होंने इलाज़ के लिए पैसे इकट्ठे करने की कोशिश की और वे सफल हुए।

दरअसल उन्होंने अपने क्षेत्र के सांसद, विभिन्न संगठनों व आम लोगों की मदद से ऑपरेशन के लिए पैसे जमा किए और सफलतापूर्वक उनका ऑपरेशन हुआ। इस तरह मनीराम की श्रवण शक्ति वापस आ गई। अब उनके लक्ष्य के बीच में शारीरिक अक्षमता का रोड़ा नहीं था। फिर साल 2009 में जब उन्होंने पुनः UPSC एग्जाम दिया और उसमें पास भी हुए। इस प्रकार से मनीराम की 15 साल की प्रतीक्षा, लगन, मेहनत का प्रतिफल उन्हें मिला और अंततः मनीराम अपना लक्ष्य हासिल करते हुए IAS ऑफिसर बने।

मनीराम शर्मा (IAS Maniram Sharma) की कहानी खासतौर पर उन शारीरिक अक्षमता वाले व्यक्तियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, जो सोचते हैं कि हम जीवन कुछ नहीं कर सकते।