गरीब किसान के बेटे, कैलाश पात्रा ने 2000 रुपये की नौकरी से कैसे बनाई 250 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी

हमें जीवन के हर क़दम पर ऐसे लोगों की भीड़ दिखाई देगी, जो अपनी नाकाम ज़िंदगी का दोष अपनी क़िस्मत को देते रहते हैं। वे केवल अपनी परिस्थितियों को बुरा बताते हुए कहते रहते हैं कि काश! मेरे पास यह सब होता तो मैं ये कर पाता या यह बन सकता था। लेकिन वास्तव में ऐसी बातें करने वाले लोग असल जीवन में कुछ करना ही नहीं चाहते हैं।

यदि वे दृढ़ संकल्प करके जीवन में कुछ करने की ठान लेते तो वे लोग हालातों के गुलाम बनते बल्कि हालात उनके गुलाम होते। हमारी इसी बात का सटीक उदाहरण प्रस्तुत करती है, सफल बिज़नेस मेन की यह कहानी, जिन्होंने अपने अत्यंत मुश्किल हालातों का सामना करते हुए ऐसा ऊंचा मुकाम हासिल किया, जहाँ पहुँचने के बारे में शायद कोई गरीब व्यक्ति सोच भी नहीं सकता है।

कैलाश चंद्र पात्रा (Kailash Chandra Patra)

हम जिन शख़्स की बात कर रहे हैं, वे हैं ओडिशा के एक ग़रीब-पीड़ित किसान परिवार में जन्में कैलाश चंद्र पात्रा (Kailash Chandra Patra) । कैलाश और उनके परिवार ने जितने दुख झेले, जितनी कठिनाइयाँ सही उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। उनके संघर्षों की दास्तान सुनेंगे तो शायद आपको विश्वास भी नहीं होगा कि ऐसे गरीब परिवार के बेटे ने अपने बलबूते पर 250 करोड़ की कंपनी खड़ी कर ली। यह वास्तव में हैरान कर देने वाली बात है, परंतु है बिल्कुल सच।

झोपड़ी में रहते थे, पिताजी अपने कर्ज़ से परेशान होकर भाग गए

कैलाश चंद्र पात्रा के पिता जी धान की खेती करने वाले एक छोटे-मोटे किसान थे। हमारे देश में छोटे किसानों की जैसी स्थिति होती है, उसी तरह कैलाश के पिताजी की भी थी। उनके जैसे अन्य किसानों की तरह वे भी सदैव कर्ज़ में ही डूबे रहते थे। फिर जब स्थिति बहुत बदतर हो गए और कर्ज़ बहुत बढ़ गया, तो उनके पिताजी इस कर्ज़ से परेशान होकर परिवार को मुश्किल हालातों में छोड़कर भाग गए तथा फिर कभी वापस नहीं आए। फिर उनके घर का ख़र्च उनका पूरा परिवार मिलकर बड़ी मुश्किल से चला रहा था। कैलाश का परिवार छोटा भी नहीं था, उनके परिवार में वह खुद, उनकी माँ, तीन भाई और तीन बहनें थे, जो एक छोटी-सी झोपड़ी में रहते हुए अपने अभावग्रस्त व कठिन जीवन का जैसे तैसे निर्वाह कर रहे थे।

परंतु इन मुश्किल हालातों में भी कैलाश व उनके परिवार ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था। उज्ज्वल भविष्य की कामना रखते हुए वे लोग तमाम संघर्षों और अभावों से जूझते रहे। एक अच्छी ज़िन्दगी पाने के लिए कैलाश के पास और कोई व्यवसायिक विकल्प नहीं था तो अब सिर्फ़ एकमात्र शिक्षा द्वारा ही वे अपने जीवन को बदलने की आशा रखते थे, इसलिए उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा उसी झोपड़ी में रहते हुए पूरी हुई। फिर उन्होंने अपने आगे की पढ़ाई के लिए ट्यूशन पढ़ाकर पैसे जमा करना शुरू कर दिया था। फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक सज्जन व्यक्ति ने उनकी सहायता की और वे कटक में आ गए, जहाँ उन व्यक्ति ने कैलाश को रहने हेतु किराया के बिना ही एक कमरा भी दिलवा दिया।

2000 रुपए महीने की नौकरी से की शुरुआत

कैलाश ने अपनी पढ़ाई के साथ ही बच्चों को ट्यूशन कराने का काम भी जारी रखा। फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात, उन्होंने ट्यूशन बंद कर दिया तथा एक विद्युत टर्नकी प्रोजेक्ट ठेकेदार के साथ नौकरी शुरू कर दी। वहाँ उन्हें केवल ₹2000 का मासिक वेतन मिलता था, जिससे जैसे तैसे करके दो वक़्त के खाने का जुगाड़ हो पाता था।

इतना ही नहीं, उनकी कंपनी के मालिक का व्यवहार अपने कर्मचारियों के प्रति अत्यंत अपमानजनक होता था। कैलाश ने अपने जीवन में बहुत से मुश्किल हालातों का सामना किया लेकिन उनके लिए जितना पैसे कमाना आवश्यक था उतना ही उनका आत्मसम्मान भी मायने रखता था। यही वज़ह थी कि उन्होंने इस कंपनी में करीब 2 सालों तक काम करने के पश्चात नौकरी छोड़ दी।

कैलाश अपने बलबूते पर कुछ करना चाहते थे, लेकिन उनके आर्थिक हालात उन्हें ऐसा करने की मंजूरी नहीं दे रहे थे। फिर उन्होंने एक दवा की कंपनी में बिक्री कार्यकारी के तौर पर नौकरी की, लेकिन उन्हें एक जॉब से भी संतुष्टि नहीं मिली और फिर यह नौकरी छोड़कर एक इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेडिंग कंपनी में लग गए। इस इलेक्ट्रॉनिक कंपनी में उन्होंने 4 सालों तक काम किया और फिर उन्होंने फ़ैसला किया कि अब वह अपना ख़ुद का बिजनेस स्टार्ट करेंगे इसलिए यह जॉब भी छोड़ दी।

किराए की दुकान लेकर शुरू किया अपना छोटा-सा व्यवसाय

नौकरी छोड़ने के बाद कैलाश ने अपने फैसले पर कुछ विचार किया, क्योंकि वे अपना बिजनेस तो शुरू करना चाहते थे, उन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स में ट्रेडिंग का अच्छा एक्सपीरियंस भी हो गया था, परंतु अब उनके सामने पूंजी की समस्या थी। महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामानों में इन्वेस्टमेंट के लिए उनके पास पूंजी नहीं थी। लेकिन उन्होंने अपने इरादे पक्के रखे और ठान लिया था कि अब कुछ करके ही दिखाना है। फिर कैलाश ने एक 40 वर्ग फुट की दुकान किराए पर लेकर टीवी एंटीना व बूस्टर डिवाइस इत्यादि कम मूल्य वाली इलेक्ट्रॉनिक चीजें लोगों को बेचना शुरू किया। अपने कारोबार की शुरुआत उन्होंने ₹300 किराये की एक दुकान से की।

एक इंटरव्यू के दौरान कैलाश बताते हैं कि “मैं हमेशा से ही कुछ करना चाहता था। कुछ बड़ा और अनूठा करना हमेशा मेरी विचारधारा थी। मेरी ख़ुशी हमेशा ग्राहकों की सेवा करने में रही है।”

कैलाश अपने पास के शहर में जाकर किसी बड़ी दुकान से टीवी से सम्बंधित उपयोगी सामान खरीदते थे और फिर उसे कटक के दोलामुंडई में स्थित अपनी छोटी-सी दुकान पर बेचा करते। इसी प्रकार से उनका काम चलने लगा, हालांकि उन्हें ज़्यादा मार्जिन नहीं मिलता था, पर उस समय में टीवी सेट नए-नए आए थे तो लोगों को उससे जुड़ी चीजों की भी आवश्यकता पड़ती रहती थी। जिससे उनकी बिक्री ज़्यादा होती थी, यही कारण था कि उन्होंने काफ़ी कम वक़्त में कम मार्जिन के बावजूद अच्छी कमाई कर ली थी।

बड़ी दुकान किराए पर ली और बैंक से लोन लेकर बिजनेस में पैसे लगाए

इस तरह से व्यापार करते हुए कैलाश ने बहुत ही बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी के मालिकों से अच्छे व्यवहार स्थापित कर लिए थे। फिर जब उनके पास की ही एक दुकान खाली हुई तो उन्हें दुकान को बढ़ाने का अवसर मिला। वह पास की बड़ी दुकान 80 वर्ग फुट थी और रोड से सटी हुई भी थी। उन्होंने जितने भी पैसे पहुँचाए थे, वह इस दुकान के लिए 6000 रुपये एडवांस किराया भरने में लगा दिए।

उनकी अच्छी बिक्री व इलेक्ट्रॉनिक सामानों के वितरकों के साथ अच्छे व्यवहार की वज़ह से उनको क्रेडिट लाइन पर टीवी सेटों का स्टॉक लेने में सहायता मिली। जिससे उनका टर्नओवर बढ़ा तथा आमदनी भी बढ़ी। जिसके बेस शीघ्र ही उन्हें इलाहाबाद बैंक द्वारा 2 लाख रुपए का बिजनेस लोन भी प्राप्त हुआ। बैंक से लिए गए इस लोन से उन्होंने (Patra Electronics) बदामबड़ी में अपनी नई दुकान खोली, जो अब इलेक्ट्रॉनिक दुकानों की एक बहुत बड़ी शृंखला बन गयी है।

अब करते हैं ₹ 250 करोड़ का कारोबार

फिर तो वे लगातार तरक्क़ी की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे और कभी पीछे देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वर्तमान समय में उनकी पात्रा इलेक्ट्रॉनिक्स नामक कम्पनी भारत के ओडिशा राज्य में प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स कम्पनियों में गिनी जाती है। कैलाश चंद्र पात्रा ने करीब सभी बड़े इलेक्ट्रॉनिक ब्रांड्स के साथ टाई-अप कर लिया है और उन्होंने अपने कारोबार से बहुत नाम कमाया है। आज ओडिशा राज्य में उनकी 22 दुकानें हैं, जिनसे पिछले वित्त वर्ष में 250 करोड़ रुपयों का कारोबार हुआ। इतनी छोटी आयु में अपने पिता द्वारा छोड़ दिए जाने पर भी ग़रीबी व अनेक प्रकार की समस्याओं से लड़ते हुए किसी शख़्स के द्वारा इतनी बड़ी सफलता प्राप्त करना वाकई में आश्चर्यजनक है।

कैलाश चंद्र पात्रा (Kailash Chandra Patra) की यह प्रेरणादायक कहानी सिद्ध करती है कि हालात और क़िस्मत चाहे कितने भी बुरे क्यों न हों, अगर आपने पक्का इरादा कर लिया है, तो आपका समय और क़िस्मत दोनों बदल सकते हैं।