कभी पैसे-पैसे को मोहताज थी यह महिला, झोपड़ी से यूरोप तक पहुँची, अब दे रही हैं 22 हज़ार महिलाओं को जॉब

हमारे भारत देश की महिलाएँ मेहनत और हिम्मत की मिसाल होती हैं। वे ना सिर्फ़ घर और परिवार को अच्छे से संभालना जानती हैं बल्कि हर वह मेहनतकश काम कर सकती हैं, जो पुरुष करते हैं। कई महिलाओं ने तो अपनी प्रतिभा हिम्मत और लगन से ऐसे बड़े-बड़े काम किए हैं जिससे वह सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।

एक झोपड़ी में रहते हुए विदेश तक का सफ़र करना सरल नहीं होता है परंतु अगर मन में हर परिस्थिति का सामना करने की हिम्मत हो तो यह भी संभव हो सकता है। आपको शायद इस बात पर यक़ीन ना हो कि कोई झोपड़ी से विदेश तक कैसे पहुँच सकता है, पर यह बिल्कुल सही है जिसे साबित किया है, राजस्थान के गाँव की एक झोपड़ी में रहने वाली “रूमा देवी (Ruma Devi)” ने।

रूमा देवी (Ruma Devi)

यदि हम आपको रूमा देवी की पहले की और वर्तमान समय की फोटोस दिखाएँ तो आपको लगेगा कि यह दोनों ही अलग-अलग महिलाएँ हैं, परंतु ऐसा बिल्कुल नहीं है। इन दोनों फोटोज से ही उनके जीवन का बदलाव पता चल जाता है। एक फोटो से उनके जीवन के संघर्ष की दास्तां बयाँ होती है और दूसरी तस्वीर से उनकी सफ़लता की कहानी नज़र आती है, जिसमें वे अपनी मेहनत के बलबूते पर यूरोप ट्रिप पर हैं।

अत्यंत निर्धनता में पली-बढ़ी रूमा देवी ने बाल विवाह सहित कई गंभीर समस्याएँ झेली। ऐसा भी वक़्त था जब वह पैसे-पैसे को मोहताज हो गई थीं। परन्तु कुछ ना होने के बावजूद उनके पास एक चीज थी और वह था ‘हौंसला’ , जिसके दम पर उन्होंने कामयाबी प्राप्त की और अब अपने जैसी 22 हज़ार गरीब महिलाओं को रोज़गार भी दे रही हैं।

रूमा देवी का परिचय (Ruma Devi)

रूमा देवी (Ruma Devi) मूल रूप से राजस्थान के बाड़मेर (Barmer) जिले की रहने वाली हैं। उनका सारा बचपन ग़रीबी और अभावों में गुजरा। इतना ही नहीं उन्होंने बाल विवाह की कुप्रथा का दंश भी झेला, बहुत कम उम्र में विवाह कर दिए जाने से उनके सारे सपने मन में ही रह गए थे, परंतु अपनी क़िस्मत ख़ुद लिखते हुए उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर सफलता प्राप्त की।

आपको बता दें कि रूमा जी राजस्थानी हस्तशिल्प कला जैसे कि साड़ी, चादर, कुर्ता वगैरह अलग-अलग कपड़े तैयार करने में बहुत कुशल हैं। उनके बनाए गए वस्त्र ना केवल हमारे देश में बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हैं। आज वे भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित क्षेत्रों जैसे बाड़मेर, जैलसमेर और बीकानेर जिले से लगभग 75 गांवों की 22 हज़ार महिलाओं को रोजगार प्रदान करती हैं। इनके द्वारा बनाया गया महिलाओं का ग्रुप जो प्रोडक्ट्स तैयार करता है वह लंदन, जर्मनी, सिंगापुर व कोलंबो के फैशन वीक में भी प्रदर्शित हो चुके हैं। पर यह सब उनके लिए आसान नहीं रहा, कड़ी मेहनत के बाद उन्हें यह मुकाम हासिल हुआ है।

5 वर्ष की आयु में माँ चल बसी

आज रूमा देवी हजारों गरीब महिलाओं को रोजगार देकर ज़िन्दगी सुधार रही हैं, लेकिन यहाँ तक पहुँचने के लिए उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्षों के सामना किया। रुमा का जन्म सन् 1988 में राजस्थान के बाड़मेर के रावतसर जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम खेताराम व माँ का नाम इमरती देवी था।

वह अपने परिवार के साथ वे एक झोपड़ी में रहा करती थी। जब वे केवल 5 वर्ष की थीं, तभी उनकी माँ चल बसी। 7 बहनों और एक भाई में रूमा देवी सबसे बड़ी हैं। फिर उनके पिता ने अपने बच्चों को संभालने के लिए दूसरी शादी कर ली, पर रूमा अपने चाचा के साथ ही रहने लगी थी।

8वीं क्लास तक ही कर सकी थी पढ़ाई

रूमा देवी का पालन-पोषण अपने चाचा के पास रहकर ही हुआ। वहीं गाँव के सरकारी स्कूल से ही उनकी आठवीं कक्षा तक पढ़ाई हो पाई। राजस्थान के बाड़मेर में पीने के पानी की बहुत ज़्यादा समस्या रहती है। क्योंकि अत्यंत नीचे चला गया है। इस वज़ह से रूमा को के गाँव में भी पानी की बहुत समस्या आती थी तो वे भी बैलगाड़ी पर बैठकर घर से 10 किलोमीटर दूर जाकर पानी भरकर आती थीं।

17 साल की आयु में हो गयी थी शादी

रूमा देवी का विवाह केवल 17 साल की आयु में ही बाड़मेर जिले के गाँव मंगल बेरी के रहने वाले टिकूराम नामक व्यक्ति से हो गया था। रूमा के पति टिकुराम जोधपुर के “नशा मुक्ति संस्थान” में सहयोगी के तौर पर काम करते हैं। उनका एक बेटा भी है, जिसका नाम है लक्षित, वह अभी स्कूल की शिक्षा प्राप्त कर रहा है। रूमा देवी का सारा बचपन रावतसर की झोपड़ियों में गुज़र गया, लेकिन अब तो उन्होंने बाड़मेर जिले में कई मकान बनवा लिए हैं।

कैसे आया रूमा के जीवन में बदलाव?

बाड़मेर में ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान (जीवीसीएस) नामक एक NGO जिसका उद्देश्य राजस्थान राज्य के हस्तशिल्प प्रोडक्ट्स के माध्यम से महिलाओं को स्वनिर्भर बनाना था। वर्ष 2008 में रूमा देवी भी इस संस्थान से जुड़ गयी और ख़ूब लगन और मेहनत से काम करने लगीं। उन्होंने नई-नई डिजाइन के हस्तशिल्प उत्पाद निर्मित किए, जिससे मार्केट में उनके प्रोडक्ट्स की डिमांड बढ़ने लगी। फिर साल 2010 में उनको इसी NGO में अध्यक्ष के पद पर नियुक्त कर दिया गया। इस NGO का मेन ऑफिस बाड़मेर जिले में ही स्थित है।

इस संस्था के सेक्रेटरी विक्रम सिंह NGO के बारे में बताते हुए कहते हैं कि हमारे इस NGO में पास के 3 जिलों से आने वाली लगभग से 22 हज़ार महिलाएँ काम किया करती हैं। इन महिलाओं को काम करने के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं होती है बल्कि अपने घरों में रहते हुए ही वे हस्तशिल्प उत्पाद बनाया करती हैं। मार्केट में जिन प्रोडक्ट्स की डिमांड ज़्यादा होती है, उसी के अनुसार उन महिलाओं को प्रशिक्षण देकर प्रोडक्ट्स को बनाने से लेकर बेचने तक NGO उनकी सहायता करता है। आपको बता दें कि इस संस्था की सालाना कमाई करोड़ों रुपये तक है।

कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं रूमा देवी

रूमा देवी ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर जो काम किए और सफलता हासिल की, उससे सभी महिलाओं को प्रेरणा मिलती है। रूमा को साल 2018 में उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए भारत में महिलाओं को दिया जाने वाला सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘नारी शक्ति पुरस्कार‘ से सम्मानित किया गया।

इतना ही नहीं, रूमा जी 15 व 16 फरवरी 2020 को अमेरिका में हुए दो दिन के हावर्ड इंडिया कांफ्रेस में भी अपने काम का प्रदर्शन करने जा चुकी हैं। उन्हें वहाँ खासतौर पर बुलाकर अपने हस्तशिल्प उत्पाद दिखाने के साथ ही हावर्ड यूनिवर्सिटी के बच्चों को पढ़ाने का भी अवसर प्राप्त हुआ था। मशहूर रियलिटी शो ‘कौन बनेगा करोड़पति‘ में भी अमिताभ बच्चन के सामने रूमा जी को हॉट सीट पर बैठने का मौका मिल चुका है।

सोशल मीडिया पर हज़ारों में हैं इनके फ़ॉलोअर्स

गौरतलब है कि महिलाओं को स्वनिर्भर बनाने का जिम्मा उठाने वाली रूमा देवी सोशल मीडिया पर भी काफ़ी एक्टिव रहती हैं। उन्होंने एक फ़ेसबुक पेज बना रखा है, जिसे 1 लाख 64 हज़ार लाइक्स मिले हैं। इसके अलावा ट्विटर पर भी उनके 6 हज़ार 500 फॉलोअर्स हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से रूमा देवी अक्सर उनके हस्तशिल्प प्रोडक्ट्स के बारे में जानकारी देती रहती हैं।

रूमा देवी की यूरोप ट्रिप

साल 2016-2017 की बात है, तब जर्मनी में दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड फेयर आयोजित हुआ था। उस फेयर में एंट्री लेने के लिए करीब 15 लाख रुपए की शुल्क देना होता है, परन्तु रूमा देवी को उनकी सारी टीम सहित वहाँ आने का निशुल्क आमंत्रण दिया गया था। रूमा जी ने अपनी पुरानी झोपड़ी वाली और यूरोप की ट्रिप वाली फोटोज़ अपने फ़ेसबुक पेज पर भी शेयर की। जब वे यूरोप गयी थीं तब वहाँ बर्फ गिर रही थी। रूमा ने उस प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया और फोटोस के द्वारा अपने दोस्तों को भी अपने अनुभव साझा किए।

#युरोप यात्रा डायरी से गाङी के शीशे पर बर्फ वैसे ही जैसे #थार में रेत जमा होती हैं ।

Posted by Ruma Devi GVCS Barmer on Friday, July 31, 2020

उन्होंने 31 जुलाई 2020 को अपनी जर्मनी ट्रिप की फोटोज़ फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट करते हुए लिखा की ‘यूरोप यात्रा डायरी से। गाड़ी के शीशे पर बर्फ वैसे ही जैसे थार में रेत जमा होती हैं’ वहीं, 28 जून को अपनी झोपड़ी वाली फोटो शेयर करते हुए रूमा देवी ने लिखती हैं ‘दस साल पहले, हस्तशिल्प पर डॉक्यूमेंटरी शूटिंग की स्मृति’

रूमा देवी पर लिखी गयी ‘हौसले का हुनर’ नामक किताब

रूमा के हौसले व प्रतिभा को देखते हुए लेखिका निधि जैन ने उन पर एक किताब लिखी, जिसका नाम है ‘हौसले का हुनर’। उस किताब ‘हौसले का हुनर’ में रूमा देवी के जीवन संघर्ष से लेकर उनकी कामयाबी तक की सारी दास्तां बखूबी लिखी गई है। उस किताब में यह भी बताया गया कि रूमादेवी ने के समस्याओं जैसे अल्पशिक्षा, संसाधनों की कमी व तकनीकी अभावों के रहते हुए भी कैसे अपनी मेहनत से सफलता हासिल की और अपनी एक पहचान बनाते हुए गाँव की अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई।

रूमा देवी (Ruma Devi) ने अपने गाँव में रहते हुए जो कामयाबी प्राप्त की, विदेश में ट्रिप के लिए भी आमंत्रित की गईं। इसके अलावा उन्होंने हजारों महिलाओं को रोजगार के अवसर भी प्रदान किए। रूमा जी के कार्य सराहनीय हैं।