ये महिला पिछले 10 सालों से बिहार में मशरूम की खेती कर रही हैं, हर महीने उगाती हैं 20 क्विन्टल से ज़्यादा मशरूम

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लॉक डाउन की वज़ह से जहाँ एक और लोगों की नौकरियाँ चली गई, वहीं दूसरी ओर लॉकडाउन के समय में लोगों का रुझान खेती की तरफ़ भी बढ़ा है। पढ़े लिखे लोग भी खेती का महत्त्व समझ रहे हैं और अपनी जलवायु के अनुकूल विभिन्न प्रकार की फ़सल उगा कर मुनाफा कमा रहे हैं।

मेहनत से जो भी काम किया जाए, उसमें सफलता ज़रूर मिलती है। भारत देश आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है जिसमें ना सिर्फ़ पुरुष बल्कि महिलाएँ भी खेती का कार्य शौक से किया करती हैं। आज हम बिहार की रहने वाली ऐसी ही एक आत्मनिर्भर महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने मशरूम की खेती करके ना सिर्फ़ ख़ुद मुनाफा कमाया बल्कि बहुत से लोगों को रोजगार दिया और अब इस खेती के लिए प्रशिक्षण भी प्रदान करती हैं।

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10 सालों से करती हैं मशरूम की खेती, कई लोगों को मिलता है रोजगार

इस महिला का नाम है मनोरमा सिंह (Manorma Singh) , जो बिहार के वैशाली (Vaishali) ज़िलें में रहती हैं और पिछले 10 सालों से मशरूम की खेती का कार्य कर रही हैं। इनके साथ 100 और लोग भी काम करते हैं, जिनमें महिलाएँ व पुरुष दोनों हैं। यहाँ तक कि लॉकडाउन के समय में भी उनके साथ काम करने वाले सभी लोग बिना किसी रूकावट के काम करते हैं और उन्हें उनका वेतन भी दिया जा रहा है। मनोरमा सिंह अपने वर्कर्स को हर महीने 2 तारीख को वेतन दे देती हैं। इनके साथ 35 महिलाएँ नियमित रूप से काम करती हैं और अन्य लोग दिहाड़ी मजदूरी पर कार्य करते हैं।

इन मजदूरों में से एक मज़दूर किसान राजेश्वर पासवान (Rajeshwar Paswan) जो 45 साल के हैं और वैशाली जिले के हैं, वह बताते हैं कि ” मैं पिछले 4 वर्षों से मशरूम से जुड़ा हूँ और यहाँ पर काम करता हूँ। मुझे हर महीने 8 हज़ार रुपए का वेतन मिलता है और कोरोना की महामारी के समय भी मुझे वेतन मिला, इसलिए मुझे इस लॉकडाउन के समय में परेशानी नहीं आई और पैसों की दिक्कत भी नहीं हुई।

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केंचुआ खाद की सहायता उगाती हैं प्रतिमाह 20 क्विन्टल से ज़्यादा मशरूम

मनोरमा सिंह ने अपने मकान के पास में ही एक खाली पड़ी हुई झोपड़ी में सबसे पहले मशरूम हो उगाया था। पहले इन्होंने ठंड के मौसम में मासूम के पौधे के 200 बैग रखे। अब तो ना वे सिर्फ़ अपने गाँव और जिले में, वरन कई स्थानों पर मशरूम उगाती हैं और मशरूम की खेती के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं। इतना ही नहीं मनोरमा सिंह इस खेती के लिए खाद तथा बीज भी ख़ुद ही निर्मित करती हैं।

मनोरमा सिंह Mushroom Spawm निर्माण कार्य, Button Mushroom spawm बनाना, Oyster Spawm बनाने का-का कार्य भी करती हैं। लॉकडाउन के समय में इन्होंने ज़्यादा मशरूम नहीं उगाए, पर फिर भी 5 kg-6 kg मशरूम का उत्पादन अवश्य किया। वे बताती हैं कि पहले तो हमारे मशरूम की बिक्री शहरों में भी हुआ करती थी परंतु अब नहीं बिक रहे हैं।

फिर उन्होंने अपने मशरूम निकट के गांवों में बेचना शुरु कर दिया। उनके मशरूम पूरा दिन गाड़ियों पर बिकने लगे। अगर मशरूम बच जाते थे तो उनका मुरब्बा तथा अचार बनाने का काम भी शुरू किया। इसी प्रकार से लॉकडाउन के समय में भी मनोरमा सिंह ने अपना काम नहीं रोका बल्कि आमदनी के नए उपाय सोचें और अपने यहाँ काम कर रहे लोगों को भी वेतन दिया।

ग्रेजुएट मनोरमा ने कैसे शुरू किया गया यह काम?

मनोरमा सिंह (Manorma Singh) का विवाह एक किसान परिवार में हुआ था, इसलिए इनके लिए ससुराल का माहौल कुछ अलग और नया था। जब मनोरमा के पति उन्हें अपने खेत दिखाने लेकर जाते थे, तब वे मनोरमा को खेती से जुड़ी कई बातें समझाते थे, जो मनोरमा अच्छे से सुनती और समझती थीं।

आपको बता दें कि मनोरमा मनोविज्ञान विषय से ग्रेजुएट हैं। वह बताती है कि पहले तो इन्हें बच्चों और परिवार की जिम्मेदारियों की वज़ह से समय ही नहीं मिलता था, फिर जब इनके बच्चे बड़े हुए तो जिम्मेदारियाँ भी थोड़ी कम हुईं और फिर उन्होंने कुछ काम करना चाहा। इसके बाद साल 2010 में उन्होंने अपने बलबूते पर मशरूम की खेती शुरू की और आत्म निर्भर बनने की ओर क़दम बढ़ाया।

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खेती के मुद्दे को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री से भी मिलीं

मनोरम सिंह (Manorma Singh) को सरकार द्वारा “नेशनल बागानी मिशन” के तहत 15 लाख की धनराशि भी प्राप्त हुई, जिससे उन्होंने मशरूम की खेती के लिए 8 कमरे और लैब भी बनवाया। इन कमरों की ख़ास बात यह है कि इन में AC लगा हुआ है जिसकी वज़ह से सारे वर्ष मशरूम की खेती की जा सकती है।

इस कमरे में हर साल करीब 1 करोड़ रुपए तक का ख़र्च आ जाता है इसलिए मनोरमा की यह इच्छा है कि सरकार की तरफ़ से इनको एक बाज़ार उपलब्ध कराया जाए जिससे वे मशरूम की पैदावार बढ़ा पाएँ। आपको बता दें कि मनोरमा सिंह खेती से जुड़े सारे कार्य स्वयं ही करती हैं उन्हें अब तक सरकार ने कोई सहायता प्रदान नहीं की है। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर अपनी समस्या के बारे में भी चर्चा की थी, तब मुख्यमंत्री जी ने कहा था कि मैं इस बारे में अवश्य कुछ करुंगा, परंतु अभी तक तो उन्होंने कुछ नहीं किया।

मनोरमा सिंह (Manorma Singh) अपने दम पर ना सिर्फ़ आत्मनिर्भर बनीं बल्कि गाँव की अन्य महिला व पुरुषों को भी रोजगार और प्रशिक्षण दिया। उनका यह जज़्बा काबिले तारीफ है। यदि आप भी मनोरमा सिंह से कुछ सीखना चाहते हैं या बीज खरीदना चाहते हैं तो उनसे 9334929333 नम्बर पर फ़ोन करके बात कीजिए।

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