कक्षा 2 तक पढ़े इस किसान ने किया कमाल, विकसित की आम की नई किस्म, सालभर लगेंगे पेड़ पर फल

जीवन में किताबें ही सबकुछ नहीं होती। बहुत से लोग बिना पढ़े-लिखे होकर भी कुछ ऐसा काम कर देते हैं। जिनकी हमें उनसे उम्मीद तक नहीं होती। ऐसे लोग हमेशा समाज को नई दिशा देने का काम करते हैं। ख़ास तौर पर खेती बाड़ी की यदि हम बात करें तो इस पेशे में ज्यादातर अनपढ़ लोग ही लगे होते हैं। जो कि हमेशा परंपरागत खेती को ही प्राथमिकता देते हैं।

लेकिन आज हम आपको एक ऐसे किसान की कहानी बताने जा रहे हैं, जो योग्यता में तो भले ही दूसरी कक्षा पास या यूं कहें कि अनपढ़ के समान है। लेकिन उस किसान ने खेती में एक ऐसा प्रयोग करके दिखा दिया है, जो हमारे वैज्ञानिक सालों-सालों तक बेहतर गुणवत्ता की लैब और तमाम संसाधन होने के बावजूद नहीं कर पाते। आइए जानते हैं क्या है उस किसान की कहानी।

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श्रीकृष्ण सुमन (Shri Krishna Suman)

इस किसान का नाम श्रीकृष्ण सुमन (Shri krishna suman) है। इनकी उम्र फिलहाल 55 साल है। ये राजस्थान के कोटा (Kota) जिले के रहने वाले है। इनकी उपलब्धि ये है कि इन्होंने आम की एक ऐसी नई क़िस्म की खोज कर दी है जो पूरे साल भर आम देती है। जबकि यदि हम सामान्य आम के पेड़ों की बात करें तो उसमें केवल गर्मियों के मौसम में ही आम लगते है।

कैसे आया ये आइडिया

श्री कृष्ण बताते हैं कि उनके घर में भी पहले परंपरागत खेती की जाती थी। जिसमें मुख्यतः धान और गेहूँ उगाया जाता था। लेकिन परंपरागत खेती में परेशानी ये थी कि इसमें पानी, जानवर, सूखे की समस्या से हर साल दो चार होना पड़ता था। यदि इन समस्याओं से इन फसलों को बचा भी लिया जाए तो भी कोई बेहतर आमदनी नहीं होती थी। कई बार तो यदि फ़सल की अच्छी पैदावार नहीं होती थी तो लागत तक निकालना मुश्किल हो जाती थी।

दूसरी कक्षा तक की है पढ़ाई

श्री कृष्ण के काम को देखकर भले ही आपको लगा हो कि श्री कृष्ण उच्च शिक्षित होंगे। पर हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। उन्होंने महज़ दूसरी क्लास तक ही पढ़ाई की हुई है। लेकिन उनका दिमाग़ हमेशा कुछ नया और क्रिएटिव करने पर काम करता रहता है। इसलिए वह हमेशा कुछ न कुछ करते रहते है।

पहले शुरू की गुलाब की खेती

श्री कृष्ण हमेशा से परिवार की आमदनी को बढ़ाने के लिए चिंतित रहा करते थे। इसी के चलते उन्होंने दूसरी कक्षा में ही स्कूल छोड़ दिया और माली के काम पर लग गए। उन्हें फूल-पौधों से बड़ा लगाव था इसलिए उन्होंने गुलाब (Rose Farming) की खेती शुरू की। क्योंकि उन्हें पता था कि धान गेहूँ से सीमित आमदनी ही की जा सकती है। इसके बाद जब उन्होंने गुलाब को बाज़ार में बेचा तो उससे अच्छी आमदनी हुई। अब वह गुलाब के साथ ही आम के पेड़ों की खेती में भी उतरना चाहते थे।

इस तरह हुई नई क़िस्म को खोज

श्री कृष्ण के इस नए क़िस्म के आम की खोज बेहद दिलचस्प है। साल 2000 में उन्होंने देखा जब गुलाब के साथ आम के पेड़ भी लगाए तो एक आम का पेड़ बड़ी ही तेजी से विकसित हो रहा है। साथ ही इसकी पत्तियाँ भी गहरे हरे रंग की हैं, जो कि दूसरे आम के पेड़ों से बेहद अलग हैं। उन्होंने देखा कि इस पेड़ में पूरे साल बौर आते हैं।

इसे देखकर श्री कृष्ण ने इस आम के पेड़ की 5 क़लम तैयार करने का फ़ैसला किया। क़लम तैयार करने में करीब पन्द्रह साल का समय लग गया। पन्द्रह साल बाद जब क़लम तैयार हो गई और उसे ज़मीन में लगाया, तो श्रीकृष्ण उस क़लम का कमाल देख आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने पाया कि महज़ दो साल बाद ही उसमें आम के फल लगने शुरू हो गए थे। साथ ही उसका विकास भी बहुत तेज गति से हो रहा था। आपको बता दें कि क़लम तैयार करना पौधे की वह प्रक्रिया होती है, जिसमें एक पौधे की टहनी से ही दूसरा पौधा तैयार कर लिया जाए।

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क्या है इस ‘सदाबहार किस्म’ की ख़ास बात

श्री कृष्ण की तैयार की गई इस नई क़िस्म को ‘सदाबहार किस्म’ के नाम से जाना जाता है। भले ही इस क़लम की देखभाल श्रीकृष्ण को सालों तक करनी पड़ी पर उसके नतीजे भी आज उतने ही शानदार हैं। ‘सदाबहार आम’ की विशेष बात तो ये हैं कि इसके पेड़ में दूसरे पेड़ों की तरह बीमारी या कोई और गड़बड़ी नहीं पैदा होती। साथ ही सदाबहार आम का पेड़ ज़्यादा बड़ा नहीं होता। इसलिए इसे अपने घर के आंगन में भी लगाया जा सकता है। यदि हम सदाबहार आम के स्वाद की बात करें तो इसके फल का स्वाद भी मीठा, लंगड़े आम की तरह ही होता है।

इस पेड़ का आकार छोटा होने के चलते इसे शुरुआती कुछ साल तक गमले में लगाकर भी रखा जा सकता है। इसके फल के गुदे का रंग गहरा नारंगी होता है, साथ ही इसका फल मिठास से भरपूर होता है। इसके फल की ख़ास बात ये होती है कि इसमें कम फाइबर होता है, जो कि इसे दूसरी आम की किस्मों से इसे अलग करता है। पोषक तत्वों से भरपूर आम स्वास्थ्य के लिए भी बहुत अच्छा माना जाता है।

श्री कृष्ण को मिल चुके हैं कई पुरस्कार

श्री कृष्ण इस नई क़िस्म को खोजकर आज ख़ूब वाहवाही तो बटोर ही रहे हैं साथ ही उन्हें कई पुरस्कारों से भी नवाजा जा सकता है। श्रीकृष्ण सुमन को एनआईएफ का नौवां राष्ट्रीय तृणमूल नवप्रवर्तन एवं विशिष्ट पारंपरिक ज्ञान पुरस्कार (नेशनल ग्रासरूट इनोवेशन एंड ट्रेडिशनल नॉलेज अवार्ड) दिया गया है। साथ ही इस नई क़िस्म को कई अन्य मंचों पर भी मान्यता दी गई है।

आपको बता दें कि एनआईएफ आज इस नई क़िस्म की जानकारी दूसरे लोगों तक भी पहुँचा रहा है। जिसमें किसान संगठन, राज्य के सरकारी कृषि विभागों, स्वयंसेवी संगठनों तथा किसान मित्रो के माध्यम से इस क़िस्म का ज़्यादा से ज़्यादा विस्तार करने की कोशिश की जा रही है। ताकि ज़्यादा से ज़्यादा किसान इस क़िस्म का लाभ उठा सकें।

दूसरे देशों से भी आ रहे हैं आर्डर

श्री कृष्ण की इस नई क़िस्म की लोकप्रियता चरम पर पहुँच गई है। साल 2017 से लेकर 2020 तक उन्हें विदेशों से करीब आठ हज़ार तक पौधों के ऑर्डर मिल चुके हैं। वह 2018 से 2020 तक आंध्र प्रदेश, गोवा, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, केरल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और चंडीगढ़ को 6000 से ज़्यादा पौधों की आपूर्ति कर चुके हैं। साथ ही लगातार ये मांग बढ़ती ही जा रही है।

वह 500 से ज़्यादा पौधे राजस्थान और मध्यप्रदेश के कृषि अनुसंधान केंद्रों में अब तक लगा चुके हैं। साथ ही राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के तमाम अनुसंधान केंद्रों में सैकड़ों आम की कलमें भेज चुके हैं।

मिल चुकी है सरकारी मंजूरी

श्री कृष्ण की इस नई क़िस्म की लोकप्रियता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि एनआईएफ की मदद से अब उनकी आम की इस नई क़िस्म की राष्ट्रपति भवन तक में लगाने पर चर्चा चल रही है। एनआईएफ भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है। जिसकी तरफ़ से भी अब श्री कृष्ण की इस नई क़िस्म को मंजूरी मिल गई है।

एनआईएफ ने आईसीएआर-राष्ट्रीय बागवानी संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर रिसर्च (आईआईएचआर) , बैंगलोर की तरफ़ से भी इसे मंजूरी मिलने की संभावना है। अब इस संस्थान के अधिकारी भी घटनास्थल पर जाकर चीजों का मूल्यांकन करने पर विचार कर रहे है। इसी के साथ राजस्थान के जयपुर स्थित एसकेएन एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने इसकी फील्ड टेस्टिंग भी की। अब इस क़िस्म का पौधा और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम तथा आईसीएआर-नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (एनवीपीजीआर) नई दिल्ली के तहत पंजीकरण कराने की प्रक्रिया चल रही है। जो कि संभावना है कि जल्दी ही पूरी हो जाएगी।