ग्राफ्टिंग तकनीक के जरिए जंगली पौधों से बैंगन, टमाटर उगा रहा मध्य प्रदेश का यह किसान – तरिका सीखें

Grafting Technique – आम बोलचाल की भाषा में हम “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय” वाली कहावत नकारात्मकता को दिखाने के लिए करते हैं परंतु आज हम जिसके बारे में बात करने जा रहे हैं उसने इस कहावत को सकारात्मकता में बदल दिया है। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, परंतु मध्य प्रदेश का एक किसान ‘ग्राफ्टिंग तकनीक’ का उपयोग कर जंगली पौधों से ही बैंगन और टमाटर जैसी सब्जियाँ उगा कर इस कहावत को सकारात्मक बना रहा।

मध्यप्रदेश के भोपाल के खजूरी कला के किसान ‘मिश्रीलाल राजपूत’ (Mishrilal Rajput) को कृषि के क्षेत्र में कुछ नया करने की चाह थी इसके लिए उन्होंने ग्राफ्टिंग तकनीक को सीखा और फिर इसके जरिए जंगली पौधों के ऊपर टमाटर, बैंगन और अन्य सब्जियाँ उगा रहे हैं। इनके द्वारा उगाई गई ये सब्जियाँ पूर्णतः होती हैं। आइए जानते हैं मिश्रीलाल से ग्राफ्टिंग तकनीक का उपयोग कर सब्जियों को उगाने का तरीका-

ग्राफ्टिंग तकनीक (Grafting Technique) के जरिए सब्जियों को उगाने की प्रक्रिया-

  • इस तकनीक के लिए आवश्यक है- दो ट्रे, जंगली पौधें और जिन सब्जियों की खेती करनी है उनके पौधें
  • एक ट्रे में जंगली पौधा और दूसरे ट्रे में टमाटर बैंगन या अन्य पौधों को लगा दें
  • जब टमाटर बैंगन या अन्य पौधे 15 दिन के हो जाएँ और जंगली पौधों की लंबाई 6 इंच की हो जाए तो जंगली पौधों के तनें में कट लगाकर जिस सब्जियों को उगाना है उसके पौधों को ग्राफ्ट कर दें।
  • ग्राफ्ट करने के बाद लगभग पंद्रह दिन तक इसे धूप से बचा कर रखें।
  • 15 दिन बाद इन पौधों को खुले खेत में लगा दें।

ग्राफ्टिंग तकनीक के जरिए एक ही पौधे में कई जगह पर कट लगाकर हर कट में अलग-अलग प्रकार की सब्जियाँ उगाई जा सकती हैं और इसके लिए भी मिश्रीलाल प्रयासरत हैं। उनके अनुसार ग्राफ्टिंग तकनीक में टमाटर के 100 में से 60 पौधे सफलतापूर्वक लग जाते हैं और मिर्च और अन्य पौधे भी 80% तक सफल होते हैं।

खेती के लिए खाद के रूप में वह अपने पौधों में गोबर और गोमूत्र आदि का उपयोग कर ‘अमृत पानी’ नामक एक विशेष खाद तैयार कर इसका उपयोग करते हैं। एक एकड़ ज़मीन के लिए 200 लीटर का घोल पर्याप्त होता है। पौधों को कीटों से बचाने के लिए भी मिश्रीलाल जैविक कीटनाशक का उपयोग करते हैं।

ग्राफ्टिंग तकनीक की विशेषता

इस तकनीक से तैयार पौधों की जड़ें जंगली पौधों की होती है जिससे इसमें पानी की खपत बहुत कम होती है साथ ही यह विपरीत परिस्थितियों जैसे सूखा और बाढ़ में भी ज़्यादा क्षतिग्रस्त नहीं होतीऔर इन परिस्थितियों में भी तेजी से विकसित होती हैं। इसके द्वारा तैयार पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी काफ़ी अधिक होती है। इस तकनीक की सबसे ख़ास बात यह है कि इसके जरिए कम लागत में ही अधिक उत्पादन होता है जिससे काफ़ी लाभ कमाई जा सकती है।

कुछ अलग करने की चाह में मिश्रीलाल ने जो करिश्मा कर दिखाया है वह निश्चय ही कृषि क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल साबित हुई है। इनसे प्रेरणा लेकर अन्य लोग भी इस तकनीक से लाभान्वित हो रहे हैं।