गरीबी के आगे इस बच्चे ने घुटने टेकना नहीं किया मंजूर, दिये की रोशनी में पढ़कर भी बन गया IAS

रायबरेली; हम में ज्यादातर लोग किसी भी काम को करने से पहले अपने संसाधन देखते हैं। आज के दौर में बच्चों का स्कूल-काॅलेज घर से दूर है तो भी वह ये कहकर जाने से मना कर देते हैं कि साधन नहीं है इतनी दूर कैसे जाऊँ। मतलब साफ़ है कि आज के दौर में कोई संसाधनों के अभाव में नहीं जीना चाहता। अपनी असफलता का दोषी वह ख़ुद की बजाय अपने पास संसाधनों की कमी को देते हैं। लेकिन ये कड़वा सच है कि इस तरह के लोग कभी इतिहास नहीं लिखने में कामयाब नहीं होते। इतिहास में उन्हीं को याद रखा जाता है जिन्होंने हालातों की परवाह ना करते हुए सिर्फ़ अपने लक्ष्य को पाने की जिद्द रखी। वही लोग अंत में कामयाबी के शिखर को छूते हैं और दुनिया भी उन्हें ही सलाम करती है।

आज हम आपको एक ऐसे ही होनहार बच्चे की कहानी बताने जा रहे हैं। जिसके पास संसाधनों का सिर्फ़ अभाव ही नहीं, बाल्कि संसाधन नाम की चीज भी नहीं थी। पर उन्होंने इसकी परवाह किए बिना अपना लक्ष्य ध्यान में और अतत: देश की सबसे बड़ी और कठिन सिविल सर्विसेज (UPSC) की परीक्षा को पास कर एक नया मुकाम खड़ा कर दिया।

कौन हैं वह होनहार (IAS Ashutosh Dwivedi)

देश के इस होनहार का नाम आशुतोष द्विवेदी (IAS Ashutosh Dwivedi) है और इसका जन्म उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में हुआ था। आशुतोष के पिताजी तो पढ़े लिखे हैं पर माताजी अनपढ बराबर हैं पर वह भी शिक्षा के महत्त्व को बखूबी समझती हैं। आशुतोष का शुरूआती जीवन तो संघर्ष से भरा हुआ है, पर आगे का सफ़र मानो किसी फ़िल्मी कहानी की तरह है। लेकिन ये कहानी किसी फ़िल्म की नहीं, बाल्कि आशुतोष के खून-पसीने की मेहनत की है।

कभी साइकिल चलाकर आशुतोष स्कूल में पढ़ने जाया करते थे। इसके बाद घर पर आकर दिए की रोशनी में घंटों पढ़ाई किया करते थे। पर कभी परेशानियों से परेशान नहीं हुए। दिये की रोशनी में भी पढ़कर आज वह IAS जैसी कठिन परीक्षा को पास कर चुके हैं। छोटे से सफ़र में आशुतोष ने जो देखा वह शायद फ़िल्मों में ही देखने को मिलता है।

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इस तरह की पढ़ाई

आशुतोष ने सबसे पहले अपने गाँव से ही शुरूआती शिक्षा प्राप्त की। ग्रामीण परिवेश होने के चलते उनकी शिक्षा का माध्यम हिन्दी ही रहा। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए आशुतोष को कानपुर जाना पड़ा। जहाँ HBTI से उन्होंने अपना बीटेक (B. TECH) पूरा किया। बीटेक की पढाई पूरी करने के लिए बाद आशुतोष प्राइवेट नौकरी करने लगे। लेकिन नौकरी के चक्कर में उन्हें उनका सपना कहीं पीछे छूटता-सा दिखाई दिया। जिसके लिए कभी वह घंटों साइकिल चलाकर स्कूल जाया करते थे। आशुतोष एक होशियार विधार्थी थे। अपने साथियो की तुलना में उन्होंने जिस तरह से पढाई की थी वह उन्हें उनके साथियों से कहीं बहुत आगे ले जाती थी।

‘कलेक्टर’ शब्द से था विशेष लगाव

आशुतोष बताते हैं कि जब वह स्कूल में पढ़ा करते थे तो बात-बात पर बच्चों को ‘कलेक्टर’ बनने की बात कही जाती थी। इससे उन्हें आभास हो गया था कि कलेक्टर वाकई कोई बड़ी चीज होती होगी। इसके अलावा उनके स्कूल के बच्चे जब भी कभी कुछ बड़ा काम कर देते थे तो उनको कलेक्टर से सम्मानित किया जाता था। तब से उन्हें कलेक्टर शब्द बड़ा प्रभावित करता था।

एक बार की बात है आशुतोष को गाँव की कुछ औरतों ने उन्हें एक काम बता और कहा कि अगर तुमसे ना हो तो कलेक्टर साहब को बता देना वह कर देंगे। उस समय आशुतोष को लगा कि आज भी आम आदमी को नेता, नौकर, सरकार से ज़्यादा ‘कलेक्टर’ पर भरोसा है। वहीं उन्हें सबकुछ लगता है। बस उसी दिन उन्होंने नौकरी छोड़ दी और UPSC की परीक्षा की तैयारी में जुट गए। अब उन्हें समझ आ गया था कि UPSC की तैयारी क्यों करनी चाहिए।

भाई को निराश देख मिली प्रेरणा

आशुतोष बताते हैं कि उनके बड़े भाई भी UPSC की परीक्षा की तैयारी कर चुके हैं। उन दिनों आशुतोष छोटे थे तो इतना जानते थे कि भाई साक्षात्कार देकर आए हैं। हुआ यूं कि एक बार भाई के साक्षात्कार का नतीजा आने वाला था। जिसे आशुतोष ही पास की दुकान पर निकलवाने गए थे। आशुतोष ने जब भाई को बताया कि आप साक्षात्कार में पास नहीं हो पाए तो भाई बेहद निराश हो गए। उनकी निराशा को आशुतोष देख नहीं पाए। आशुतोष ने तभी ख़ुद से वादा किया कि अब कुछ भी हो जाए वह अपने भाई के सपने को ख़ुद से पूरा करके दिखाएंगे। भाई की इस निराशा ने उन्हें अपने संकल्प को और मज़बूत करने की प्रेरणा मिल गई।

कभी नहीं मानी हार

आशुतोष बचपन से ही बेहद संघर्ष करते हुए आए थे। लेकिन कभी उन्होंने हार नहीं मानी। वह मानते हैं कि UPSC एक तपस्या है। इस तपस्या में या तो व्यक्ति सफल हो जाता है या सिद्धि प्राप्त कर लेता है। UPSC का ये सफ़र आपको कहीं ना कहीं ज़रूर ले जाता है।

अपने पहले दो प्रयासों में असफल होने के बाद भी आशुतोष ने हार नहीं मानी। इसके बाद उन्होंने तीसरा प्रयास दिया जिसमें वह सफल हो गए। लेकिन रैंक के हिसाब से उन्हें वह पद नहीं मिला जिसकी कल्पना उन्होंने बचपन में कभी की थी। इसके बाद उन्होंने साल 2017 में फिर से परीक्षा दी। इस बार उन्होंने 70वीं रैंक के साथ IAS या IPS का पद ही मिलना निश्चचित था। इसके बाद मानो आशुतोष का साइकिल और दिये के आगे पढ़ने का मकसद पूरा हो गया था। आशुतोष बताते हैं कि इस बीच उनकी शादी भी हो गई थी। इस तैयारी के काम में उनकी पत्नी ने भी उनका भरपूर साथ दिया। वह अपनी इस सफलता का श्रेय अपनी पत्नी और परिवार को देते हैं।

क्या दी सलाह?

अंत में आशुतोष (IAS Ashutosh Dwivedi) UPSC की परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को सलाह देते हैं। कि कभी भी संसाधनों, माहौल और परिवार को लक्ष्य से जोड़कर ना देखें। यदि आपका संकल्प पक्का है तो सफलता निश्चचित होगी। आपकी भाषा कोई भी हो। ये सब कोई मायने नहीं रखती। मायने रखती है तो सिर्फ़ आपकी मेहनत और ईमानदारी। इसलिए कभी भी हमें परीक्षाओं और नतीजों से घबराना या टूटना नहीं चाहिए।