अब गाय के गोबर से तैयार होगी बिजली, एक गाय के गोबर से पूरे साल जगमग होंगे 3 घर

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Electricity produce by cow dung – भारत में गाय के गोबर (Cow dung) को कई अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें उबले यानी कंडे बनाने से लेकर गोबर को खाद के रूप में खेतों में डालना शामिल है। इसके अलावा गाय के गोबर का इस्तेमाल बायोगैस, गोबर गैस और दिए आदि बनाने के लिए भी किया जाता है।

लेकिन क्या आपने कभी गाय के गोबर से बिजली बनाने (Electricity produce by cow dung) के बारे में सोचा है, अगर नहीं… तो आज इस प्रक्रिया के बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। गाय के गोबर से तैयार बिजली से न सिर्फ बिल में कमी आएगी, बल्कि कई गाँव और कस्बे भी रोशन हो जाएंगे।

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गाय का गोबर और उसके अनेक इस्तेमाल

भारतीय गाँव और कस्बों में गाय का पालन और उसके गोबर का इस्तेमाल बहुत ही आम बात है, जिसे धूप में सूखाकर कंडे यानी उबले तैयार किए जाते हैं। फिर इन्हीं कंडों को चूल्हे में लगाकर आग जलाई जाती है और घर के सदस्यों के लिए खाना पकाया जाता है। इसके अलावा खेतों में फसलों को तैयार करने के लिए पड़े पैमाने पर गोबर की खाद का छिड़काव किया जाता है, जिससे बाज़ार से कैमिकल युक्त खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है।

गाय का गोबर स्वास्थ्य के लिए भी काफी लाभदायक माना जाता है, जिसकी वजह से कई लोग इसका सेवन भी करते हैं। कोरोना काल के दौरान सोशल मीडिया पर ऐसी बहुत-सी वीडियो वायरल हुई, जिसमें एक डॉक्टर ने गाय का गोबर खाते हुए इसके कई स्वास्थ्य लाभ बताए थे।

लेकिन स्वास्थ्य और रोजमर्रा के कामों के अलावा अब गाय के गोबर का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए भी किया जा रहा है। ब्रिटेन के किसानों ने एक नई पहल करते हुए गाय के गोबर से बिजली बनाने (cow poo can produce electricity) का काम किया है, जिसकी वजह से उनका बिजली का बिल शून्य हो चुका है।

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गाय के गोबर से तैयार की जाती है बिजली (Electricity produce by cow dung)

ब्रिटेन के किसानों की मानें तो गाय के गोबर से बिजली तैयार (Electricity produce by cow dung) की जा सकती है, जिसके लिए गोबर को पाउडर में तब्दील करना होगा। ब्रिटेन के किसानों ने इस दावे पर मोहर लगाने से पहले गाय के गोबर के साथ कई तरह के प्रयोग किए, जिसका चौंकने वाला रिजल्ट सामने आया है।

ब्रिटिश किसानों ने इस प्रयोग के चलते गाय के एक किलोग्राम गोबर से इतनी ज्यादा बिजली तैयार कर ली थी कि उससे लगातार 5 घंटे तक वैक्यूम क्लीनर को चलाया जा सकता है। जिससे यह साफ हो जाता है कि पूरे दिन में गाय के गोबर से कई किलोवॉट की बिजली बनाई जा सकती है।

इस प्रयोग को ब्रिटेन के आर्ला डेयरी (Arla Dairy) के किसान शामिल थे, जिन्होंने डेयरी से निकलने वाले गाय के गोबर को पहले पाउडर में तब्दील किया। इसके बाद उन्होंने उस पाउडर से बैटरियाँ तैयार की, जिन्हें काउ बैटरी नाम दिया गया है।

यह काउ बैटरी AA साइज की हैं, जिनकी मदद से तकरीबन साढ़े तीन घंटे तक लगातार कपड़ों में प्रेस की जा सकती है। इतना ही नहीं ब्रिटिश किसानों ने गाय के गोबर से तैयार की गई बैटरी की जांच भी करवाई है, ताकि आगे चलकर उसके इस्तेमाल से ज्यादा से ज्यादा बिजली बनाई जा सके।

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सालभर नहीं होगी बिजली की किल्लत

गाय के गोबर से तैयार काउ बैटरी को ब्रिटेन की बैटरी एक्सपर्ट कंपनी GP BATTERIES ने जांचा है, जिसके बाद कंपनी ने दावा किया है कि एक गाय के गोबर से तैयार काउ बैटरी से पूरे एक साल तक तीन घरों की बिजली की खपत पूरी की जा सकती है।

गाय के एक किलोग्राम गोबर से 3.75 किलोवाट बिजली पैदा होती है, इस हिसाब से अगर 4, 60, 000 गायों के गोबर से काउ बैटरी तैयार की जाए तो उसकी मदद से 12 लाख घरों को बिजली सप्लाई की जा सकती है।

आर्ला डेयरी के किसानों की मानें तो यहाँ ज्यादातर कार्यों को गाय के गोबर से तैयार बिजली से ही पूरा किया जाता है, जबकि बिजली बनाने में वेस्ट हुए गोबर को खाद बनाकर खेतों में यूज किया जाता है। इस डेयरी में तकरीबन 4, 60, 000 गायें मौजूद हैं, जिनके गोबर से रोजाना कई किलोग्राम पाउडर तैयार किया जाता है।

इसके बाद उस पाउडर से काउ बैटरी तैयारी की जाती है और फिर उस बैटरी की मदद से ऊर्जा बनाई जाती है, जिसे तारों व इलेक्ट्रिक उपकरणों के माध्यम एक जगह से दूसरी जगह सप्लाई किया जाता है। इस तरह डेयरी में सभी बिजली के उपकरण गाय के गोबर से तैयार ऊर्जा से चलते हैं, जिसकी वजह से बिजली का बिल न के बराबर आता है।

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भारत के गाँव कस्बे हो जाएंगे रोशन

अगर ब्रिटेन के किसानों द्वारा अपनाई जा रही यह तकनीक भारत में भी लॉन्च हो जाती है, तो उसकी मदद से कई गाँव और कस्बे बिना किसी खर्च के रोशन हो जाएंगे। इसके साथ ही गाय के गोबर का इस्तेमाल भी बढ़ जाएगा और उसके वेस्ट को खाद के रूप में भी यूज किया जा सकता है।

फिलहाल काउ बैटरी का इस्तेमाल ब्रिटेन के आर्ला डेयरी (Arla Dairy) में ही किया जा रहा है, लेकिन यहाँ के किसानों को उम्मीद है कि इस तकनीक को जल्द ही अन्य गांवों व डेयरियों में भी इस्तेमाल किया जाने लगेगा।

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